पहाड़ा ठिकानेदार ने 1527 ईस्वी में मुगल बादशाह बाबर के खिलाफ खानवा युद्ध में महाराणा सांगा का साथ दिया था । महाराणा उदयसिंह जी की सुरक्षा ,हल्दीघाटी की लड़ाई में तथा महाराणा प्रताप के द्वारा पहाड़ी क्षेत्र में मुगलों के विरुद्ध छापामार युद्ध में मेवाड़ के महाराणाओ का साथ दिया था । पहाड़ा रावत बदन सिंह को द्वितीय श्रेणी के न्यायिक अधिकार प्राप्त थे उन्हें 1 वर्ष की सजा व ₹300 तक जुर्माना लगाने का तथा द फौजदारी व दीवानी मामले सुनने का एवं उसपर फैसला देने का भी अधिकार था ।
धरणेन्द्र जैन ,खेरवाड़ा
उदयपुर जिले के खेरवाड़ा उपखंड मुख्यालय से करीब 22 किमी दूर भोमट का पहाड़ा ठिकाना के पावेचा खीची चौहान पहाड़ा ठिकाने का खीची चौहान वंश का मूल और जवास ठिकाने के खीची वंश का मूल एक ही है । इस ठिकाने का संस्थापक गंगा और जवास ठिकाने का संस्थापक माणक दोनो भाई थे । उनका पिता लींबा उर्फ भीमसिंह जी थे जो गुजरात के चांपानेर ( पावागढ़ ) राज्य के राजा रावल पताई जयसिंह जी का बेटा था और 1484 ई . में गुजरात के बादशाह महमूद बेगड़ा और पावागढ़ अथवा चाँपानेर राज्य के पताई जयसिंह जी के बीच हुई लड़ाई के समय चाँपानेर छोड़कर मेवाड़ राज्य के पहाड़ी प्रदेश की ओर चला आया था । लींबा ने गुजरात से सटे हुए मेवाड़ के भोमट पहाड़ी इलाके में अपने वंश पावेचा खीची चौहान वंश ( पावागढ़ से आया खीची चौहान वंश ) का राज्य कायम किया । चूंकि यह चौहान - वंश - शाखा मूल रूप में सांभर से निकलकर दक्षिण ओर गई थी और उसी शाखा का एक राज्य गुजरात में पावागढ़ ( चाँपानेर ) में कायम हुआ था , जहां से लींबा आकर भोमट में बसा था , अत्तएव मेवाड़ के राज्य दरबार में जवास और पहाड़ा के चौहानों को सांभरिया चौहान सम्बोधित किया जाता था । जैसा कि जवास के पावेचा खीची चौहान लींबा ने जवासगढ़ ( जगरगढ़ ) आकर वहाँ पर काबिज जोगराज बांसिया को मार कर उस पर अधिकार कर लिया था । अपनी मृत्यु से लींबा ने अपने अधिकृत प्रदेश को दो भागों में विभाजित करके उसके दोनों पुत्रों गांगा और माणक में बांट दिया था । जवास गढ़ वाला प्रदेश माणक को मिला और पहाड़ा वाला प्रदेश गांगा को प्राप्त हुआ ।
पहाड़ा के पावेचा खीची चौहान 153 ठिकाना पहाडा - जवास के इतिहास के सम्बंध में जो जानकारी मिली है , उससे यह पता चलता है जवास ठिकाने की भांति पहाड़ा ठीकाने के शासकों के भी मेवाड़ राज्य के महाराणाओं के साथ निकट के सम्बंध बने रहे और मेवाड़ के संकटकाल में आवश्यकता पड़ने पर जवास के शासकों के साथ पहाड़ा के शासकों ने भी मेवाड़ के महाराणाओं की सहायता की । इसलिये पहाड़ा के ठिकानेदार ने 1527 ई . में मुगल बादशाह बाबर के खिलाफ खानवा के युद्ध में महाराणा सांगा का साथ दिया । बाद में पहाड़ों में महाराणा उदयसिंह जी की सुरक्षा के प्रबंध में , हल्दीघाटी की लड़ाई में तथा महाराणा प्रताप के द्वारा पहाड़ी क्षेत्र में मुगलों के विरुद्ध चलाये गये छापामार युद्ध में मेवाड़ के महाराणाओं की मदद की । निश्चय ही इन ठिकानेदारों को लगातार एवं समय समय पर होने वाले उपद्रव का भी सामना करना पड़ा। पहाड़ा ठीकाना खेरवाडा से 12 मील दूर है । 1930 ई . के बाद अन्य भोमट ठिकानेदारों की भांति यह ठिकाना भी मेवाड़ राज्य के अंतर्गत हो गया । उसके ठिकानेदार को महाराणा ने अपने दरबार में सामने की बैठक रावत की पदवी , दरीखाने का बीड़ा तथा पांव में सोना पहिनने की पद - प्रतिष्ठा प्रदान की । उन्नसवीं शताब्दी के अन्त में जब मेवाड़ राज्य के नियम कानून ठिकानों में भी लागू किये गये तो पहाड़ा ठिकाने में भी तदनुसार प्रबंध किये गये । महाराणा भूपालसिंह जी ने तत्कालीन पहाड़ा रावत बदनसिंह जी को द्वितीय श्रेणी के न्यायिक अधिकार प्रदान किये तदनुसार उसको अपराधी को अधिकतम एक वर्ष की सजा और 300 रुपये तक जुर्माना करने के फौजदारी अधिकार तथा 3000 रुपयों तक के दीवानी मामले सुनने और फैसला करने के अधिकार मिले । पहाड़ा ठिकाने की वार्षिक आय 15238 रुपये मानी गई थी , जिस पर ठिकाने की ओर से राज्य को दसूंद कर के 706 रुपये दिये जाते थे तथा 15 हथियार बंद सिपाही रखने पड़ते थे । ठिकाने में 27 गांव थे , जिनकी बाद में संख्या वृद्धि हो गई । ठिकानेदार के भायातपरमारवाड़ा , नगर , कातरवास , चीकलवास , ढ़ीकवास , अमझेरा (वर्तमान में डूंगरपुर)
के गांव रहे । रावत लक्ष्मणसिंह जी ने 1881 ई . में हुए भील विद्रोह में मेवाड़ राज्य और अंग्रेज सरकार का साथ दिया और अंग्रेज डाक ( उपस ) को लूटने वाले 13 व्यक्तियों को गिरफ्तार करने में लक्ष्मणसिंह जी ने बढी शक्ति और साहस का परिचय दिया । इस पर अंग्रेज सरकार के पळप लण ने उसको प्रशंसा और धन्यवाद का पत्र दिया । रावत लक्ष्मणसिंहजी का उत्तराधिकारी बदनसिंह जी हुवे । उसने 1919 ई . में जवास ठिकाने में उत्त्पन्न उत्तराधिकार के विवाद में हस्तक्षेप करके अपना दावा भी पेश किया था । जवास रावत नौबतसिंह के लाऔलाद मरने पर जब गोद लेने का सवाल उठा तो जवास के नजदीकी रिश्तेदार छाणी , थाना और सुवेरी ठिकानों की ओर से दावे रखे गये । उस समय पहाड़ा रावत बदनसिंह जी ने भी अपना दावा इस आधार पर पेश किया कि वह जवास - पहाड़ा की खीची वंश की बड़ी शाखा का वंशधर है । किन्तु अंग्रेज सरकार ने सुवेरी ( खुणादरी ) ठिकाने का दावा मंजूर करके वहाँ से कुंवर तखतसिंह जी को जवास में गोद लेने की मंजूरी दी ।
पहाड़ा ( पाड़ा ) के पावेचा खीची चौहान रावत बदनसिंह का विवाह पानरवा के सोलंकी ठिकाने के अदकालिया ठाकुर की बहिन के साथ 1907 ई . में हुआ था । उसका दूसरा विवाह डूंगरपुर राज्य के बौर ठिकाने के अर्जुनसिंह जी सोलंकी की पुत्री के साथ हुआ । बदनसिंह जी के चार पुत्र और एक पुत्री हुई । पुत्र- बलवंतसिंह , दौलतसिंह , मोहब्बतसिंह और पृथ्वीसिंह हुए । पुत्री , का विवाह ओगणा ठिकाने के रावत उदयसिंह के साथ हुआ , जिसका पुत्र कर्णसिंह जी ओगणा के वर्तमान उत्तराधिकारी है । बदनसिंह जी का उत्तराधिकारी बलवंतसिंह जी बड़ा हृष्टपुष्ट , वीर , साहसी , स्वाभीमानी और वचन का पक्का व्यक्ति था । उसके काल में जब राजस्थान सरकार में जागीरों का विलय हुआ तो उसने उसके बदले में राज्य सरकार द्वारा दिया जाने वाला मुआवजा लेने से इन्कार कर दिया । . बलवंतसिंह जी के लाऔलाद रहने से उसके छोटे भाई दौलतसिंह जी का पुत्र जयपालसिंह गोद आकर पहाड़ा का उत्तराधिकारी बने ।।
